ध्रव गुप्त
आज ‘प्रोमिस डे’ पर दुनिया भर के प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं से लगभग ऐसे ही कुछ वादे करेंगे – एक बुत बनाऊंगा तेरी और पूजा करूंगा, मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे, तू ना मिली तो हम जोगी बन जाएंगे, वादा रहा सनम होंगे जुदा न हम, चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो।
यह जानते हुए भी कि इनमें कोई वादा कभी पूरा होने वाला नहीं, न तो ऐसे वादे करने वालों में कोई संकोच होता है और न इन्हें सुनने वालों में कोई अविश्वास। वादा करने वालों को पता होता है कि प्यार अगर असफल हुआ, जिसकी संभावना सबसे ज्यादा होती है, तो वादाखिलाफी का आरोप हालात या मुक़द्दर पर मढ़ दिया जा सकता है।
प्यार सफल हुआ तो नून-तेल-गैस के चक्कर में या एक-दूसरे का असली रूप सामने आते ही कुछ ही सालों में प्रेम की सारी उद्दात भावनाएं और उम्मीदें मर ही जानी है। शादी के बाद का माहौल कुछ ऐसा बनेगा कि न वादा करने वालों में उन्हें तोड़ने का अफ़सोस बचेगा और न उनपर भरोसा करने वालों में शिकायत करने की कोई इच्छा। वैलेंटाइन बाबा त्रिकालदर्शी थे। तभी तो उन्होंने प्रेमियों को ‘प्रॉमिस डे’ के बहाने असीमित वादे करने का अवसर और प्रेमिकाओं को उनपर आंख मूंदकर भरोसा कर लेने का वरदान दिया था-न निभाओ तो क्या करेगा कोई / उनसे वादा कोई मगर करना !
